उत्तराखंड के मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में शुरू किया गया ‘जन-जन की सरकार, जन-जन के द्वार’ अभियान अपने उद्देश्य में न केवल सफल रहा, बल्कि इसने सेवा और सुशासन के नए मानक स्थापित कर दिए हैं। 45 दिनों तक चले इस विशेष अभियान का समापन एक अभूतपूर्व रिकॉर्ड के साथ हुआ है, जिसने यह सिद्ध कर दिया कि यदि सरकार की नीयत साफ हो, तो प्रशासन वास्तव में जनता के द्वार तक पहुँच सकता है।
आंकड़ों में अभियान की सफलता
इस अभियान के दौरान पूरे प्रदेश में जिस तत्परता से कार्य हुआ, उसे इन आंकड़ों के जरिए आसानी से समझा जा सकता है:
मुख्यमंत्री की सोच: भाग-दौड़ से मुक्ति और त्वरित समाधान
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का स्पष्ट मानना है कि सुशासन की पहली सीढ़ी वह है, जहाँ आम आदमी को अपने हक और सेवाओं के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर न काटने पड़ें।
“प्रशासन खुद जनता के पास पहुँचे और उनकी समस्याओं का समाधान करे, यही हमारी प्राथमिकता है। यह अभियान भले ही औपचारिक रूप से संपन्न हो गया हो, लेकिन जनता से जुड़ाव का यह सिलसिला रुकने वाला नहीं है।” — पुष्कर सिंह धामी, मुख्यमंत्री
अभियान की प्रमुख विशेषताएँ
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त्वरित निस्तारण: 51 हजार से अधिक शिकायतों में से 33 हजार से ज्यादा का समाधान मौके पर ही कर दिया गया, जो सरकारी कार्यप्रणाली में आए बदलाव को दर्शाता है।
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व्यापक जनभागीदारी: 5 लाख से अधिक लोगों का शिविरों में पहुँचना सरकार के प्रति जनता के अटूट विश्वास का प्रतीक है।
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अंतिम छोर तक पहुँच: दूरस्थ क्षेत्रों में आयोजित 681 शिविरों के माध्यम से उन लोगों तक सरकारी सेवाएँ पहुँचाई गईं, जिन्हें अक्सर जिला मुख्यालयों तक आने में कठिनाई होती थी।
भविष्य की राह: सतत सेवा का संकल्प
भले ही यह 45 दिवसीय विशेष अभियान 20 फरवरी को समाप्त हो गया हो, लेकिन मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि जन शिकायतों के प्रति संवेदनशीलता और समाधान की गति कम नहीं होनी चाहिए। प्रदेश सरकार योजनाओं की केवल घोषणा करने तक सीमित नहीं है, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन (Effective Implementation) को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रही है।
यह अभियान इस बात का प्रमाण है कि उत्तराखंड सरकार ‘विकल्प रहित संकल्प’ के मंत्र पर चलते हुए प्रदेश को विकास की नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए प्रतिबद्ध है।
