देहरादून/नई दिल्ली। उत्तराखंड की समकालीन राजनीति और विकास के इतिहास में एक नया अध्याय लिखा जा रहा है। यह अध्याय है— ‘डबल इंजन’ की ताकत और दो नेतृत्वों के बीच अटूट विश्वास का। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच की सशक्त केमिस्ट्री आज केवल राजनीतिक गलियारों की चर्चा का विषय नहीं है, बल्कि यह उत्तराखंड के जन-जन के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने वाली एक ठोस साझेदारी बनकर उभरी है। राज्य गठन के बाद से अब तक के कालखंड में, यह पहली बार देखा जा रहा है कि दिल्ली और देहरादून के बीच का समन्वय इतना सटीक और परिणामोन्मुखी है कि मुख्यमंत्री की एक दिल्ली यात्रा राज्य के लिए विकास का खजाना खोल देती है।
समन्वय की राजनीति: धामी की कार्यकुशलता और मोदी का विश्वास
उत्तराखंड जैसे कठिन भौगोलिक परिस्थितियों वाले राज्य के लिए केंद्र का सहयोग रीढ़ की हड्डी के समान है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस सत्य को न केवल समझा, बल्कि अपनी कार्यशैली से इसे सिद्ध भी किया है। उनकी कार्यकुशलता की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि जब वे दिल्ली की ओर कदम बढ़ाते हैं, तो उनके पास केवल मांगों की सूची नहीं, बल्कि उन मांगों के पीछे ठोस विजन, विस्तृत प्रोजेक्ट रिपोर्ट (DPR) और वित्तीय औचित्य का पूरा खाका होता है। यही कारण है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय नेतृत्व उन पर अटूट भरोसा जताता है।
यह भरोसा ही है कि धामी सरकार के पिछले साढ़े चार वर्षों के कार्यकाल में उत्तराखंड ने केंद्र से सर्वाधिक विकास योजनाओं को न केवल स्वीकृत कराया, बल्कि उन्हें धरातल पर उतारने का रिकॉर्ड भी स्थापित किया है। आज ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन हो, केदारनाथ-बदरीनाथ पुनर्निर्माण कार्य हो या सीमावर्ती क्षेत्रों के लिए ‘वाइब्रेंट विलेज’ प्रोग्राम—हर जगह धामी की दमदार पैरवी और मोदी का आशीर्वाद साफ झलकता है।
हरिद्वार कुंभ 2027: आस्था और आधुनिकता का ऐतिहासिक संगम
हाल ही में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की दिल्ली यात्रा ने राज्य को एक ऐतिहासिक सौगात दी है। हरिद्वार में होने वाले कुंभ मेला 2027 के लिए केंद्र सरकार द्वारा ₹500 करोड़ की धनराशि जारी करना धामी नेतृत्व की एक बड़ी कूटनीतिक और प्रशासनिक जीत मानी जा रही है। यह राशि केवल एक वित्तीय सहायता नहीं है, बल्कि यह संकेत है कि केंद्र सरकार 2027 के महाकुंभ को वैश्विक स्तर पर भारत की सांस्कृतिक शक्ति (Soft Power) के प्रदर्शन के रूप में देख रही है।
मुख्यमंत्री ने दिल्ली रवाना होने से ठीक पहले देहरादून में अधिकारियों के साथ लंबी बैठक की थी। उन्होंने स्पष्ट कर दिया था कि कुंभ में ‘ढिलाई’ शब्द के लिए कोई स्थान नहीं है। इसी प्रशासनिक कसावट का परिणाम था कि जब वे केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी. आर. पाटिल से मिले, तो उनके तर्कों और तैयारियों ने केंद्र को तुरंत बजट जारी करने के लिए प्रेरित किया।
विकास का ‘धामी मॉडल’: जटिल समस्याओं का सरल समाधान
पुष्कर सिंह धामी की राजनीति आक्रामकता से नहीं, बल्कि परिणामों से पहचानी जाती है। उनके कार्यकाल में ऐसे कई मुद्दे सुलझे हैं जो दशकों से ठंडे बस्ते में थे:
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परिसंपत्ति विवाद: उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के बीच वर्षों से उलझे परिसंपत्ति विवाद को उन्होंने अपनी सौम्यता और स्पष्ट संवाद से सुलझाया।
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कनेक्टिविटी: वंदे भारत ट्रेनों का संचालन, देहरादून और पंतनगर एयरपोर्ट का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विस्तार और ऑल वेदर रोड के लिए अतिरिक्त फंड जुटाना उनकी प्राथमिकताओं में शामिल रहा।
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ऊर्जा और जल: बहुप्रतीक्षित लखवाड़ और सौंग बांध परियोजनाओं को पर्यावरणीय और प्रशासनिक बाधाओं से बाहर निकालकर धरातल पर उतारना धामी की बड़ी उपलब्धि है।
2027 का महाकुंभ: मां गंगा की असीम कृपा और धामी का संकल्प
यह एक अद्भुत आध्यात्मिक संयोग ही माना जा रहा है कि वर्ष 2027 का महाकुंभ मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के कार्यकाल में आयोजित होने जा रहा है। धार्मिक गलियारों में इसे ‘मां गंगा की असीम कृपा’ के रूप में देखा जा रहा है। धामी स्वयं एक गहरे आध्यात्मिक व्यक्तित्व हैं, जो ‘सनातन जागरण’ के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहे हैं। उनके लिए कुंभ केवल एक भीड़ प्रबंधन का कार्य नहीं है, बल्कि यह उत्तराखंड की प्रतिष्ठा और गौरव का प्रश्न है।
कुंभ 2027 के लिए तैयार किया जा रहा रोडमैप आधुनिकता और परंपरा का मिश्रण है:
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इन्फ्रास्ट्रक्चर: 34 बड़े प्रोजेक्ट्स पर काम शुरू हो चुका है, जिसमें घाटों का सौंदर्यकरण और पुनर्निर्माण शामिल है।
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पुल और मार्ग: गंगा पर 90 मीटर स्पान का टू-लेन स्टील गर्डर पुल और कई अस्थायी पुलों का जाल बिछाया जा रहा है।
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पेयजल और स्वच्छता: श्रद्धालुओं के लिए नए ओवरहेड टैंक, ट्यूबवेल और अत्याधुनिक सैनिटेशन सिस्टम विकसित किए जा रहे हैं।
भविष्य की राह: वैश्विक मानचित्र पर उत्तराखंड
मुख्यमंत्री धामी का दृष्टिकोण स्पष्ट है—वे उत्तराखंड को अगले दशक तक देश का ‘अग्रणी राज्य’ बनाना चाहते हैं। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए वे पर्यटन, तीर्थाटन और पारिस्थितिकी (Ecology) के बीच संतुलन बनाकर चल रहे हैं। चारधाम यात्रा का सफल संचालन हो या अब कुंभ की विराट तैयारी, धामी ने यह साबित किया है कि उनके नेतृत्व में उत्तराखंड ‘अतिथि देवो भव:’ के मूल मंत्र को चरितार्थ करने के लिए पूरी तरह तैयार है।
उनकी हल्की मुस्कान और सहज व्यक्तित्व के पीछे एक दृढ़निश्चयी राजनेता छिपा है, जो जानता है कि दिल्ली से संसाधन कैसे लाने हैं और देहरादून में उन्हें पारदर्शी तरीके से लागू कैसे करना है। यही समन्वय आज उत्तराखंड की सबसे बड़ी ताकत बन गया है।
विकास की नई धुरी
आज उत्तराखंड की जनता के बीच यह विश्वास प्रबल है कि प्रदेश का नेतृत्व एक ऐसे युवा के हाथों में है, जिसकी पहुंच प्रधानमंत्री के हृदय तक है और जिसकी नजर राज्य के अंतिम गांव तक। ‘मोदी-धामी’ की यह जोड़ी उत्तराखंड के लिए समृद्धि का वह इंजन बन चुकी है, जो आने वाले दशकों के लिए विकास की पटरी बिछा रही है। 2027 का हरिद्वार कुंभ इसी विकास यात्रा का एक स्वर्णिम पड़ाव होगा, जो दुनिया को एक ‘नया उत्तराखंड’ दिखाएगा।
एक नज़र मुख्य उपलब्धियों पर:
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कुंभ 2027 के लिए ₹500 करोड़ की केंद्र से तत्काल स्वीकृति।
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34 बड़े बुनियादी ढांचा प्रोजेक्ट्स पर युद्धस्तर पर कार्य।
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केंद्र और राज्य के बीच जीरो-विलंब (Zero Delay) समन्वय।
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सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और आधुनिक विकास का सफल समन्वय।
