उत्तरकाशी। पुजारगांव धनारी में पारंपरिक सिद्धेश्वर दिलंक मेला हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। मेले में खास आकर्षण का केंद्र पेड़ में जलते हुई आग के बीच युवक पेड़ पर चढ़ते हैं और अपनी जान पर खेल कर इस परंपरा को निभाते हैं इस मेले की खासियत रहती है कि आज तक इस मेले में कोई चोटिल या घायल नहीं हुआ है यही कारण है कि इस क्षेत्र के लोगों की भगवान सिद्धेश्वर के प्रति अपार आस्था है आप भी देख सकते हैं कि किस तरीके से युवक आपके बीच पेड़ पर चढ़ रहे हैं।
इस मौके पर तीन गांवों के बीच हुआ रस्साकसी का मुकाबला रस्सी टूटने के कारण बराबरी पर छूटा। मेले के दौरान ग्रामीणों ने नृत्य कर क्षेत्र की सुख-समृद्धि की कामना की। मेले में ग्रामीण जंगल से चीड़ के गिरे दो बड़े पेड़ों को खींचकर गांव लाए। यहां रस्सों के सहारे पेड़ को खड़ा किया। इस दौरान तीन ओर से रस्सियां बांध कर पुजारगांव, दड़माली एवं गवाणा के ग्रामीणों के बीच रस्साकसी की अनूठी प्रतियोगिता हुई। हालांकि रस्सी टूटने के कारण यह मुकाबला बराबरी पर छूटा। इसके बाद पेड़ को मंदिर प्रांगण के बीच खड़ा कर इस पर घास लगाकर जलाया गया। इस दौरान प्रांगण में ग्रामीणों ने खूब नृत्य किया।
मेले में लगे व्यापारिक स्टालों से ग्रामीणों ने खूब खरीददारी की। इस अवसर पर सिद्धेश्वर देवता मंदिर के पुजारी ने विशेष पूजा-अर्चना कर ग्रामीणों को आशीर्वाद दिया।दिलंक मेले में इस बार संस्कृति की झलक वही सिद्धेश्वर मंदिर को भव्य रूप से इस बार नवनिर्माण किया गया है जिसकी भव्यता देखने को ही बनती है यह दिलंक मेला संस्कृति की एक अलग ही झलक देखने को मिलती है जब ग्रामीण एक लंबे से चीड़ के पेड़ को सिद्धेश्वर मंदिर के प्रांगण में खड़ा करते हैं इसके बाद गांव की युवा इस पर पेड़ पर जलती हुई लककियों के बीच से रस्सी को छुड़ाते हैं।
इस दौरान कई बार पेड़ पर चढ़ने वाले युवक घायल हो जाते हैं यह एक बहुत ही रोमांचकारी देखने वाला दृश्य होता है जब पेड़ पर आग लगी रहती है और गांव के ही युवक आज के ही बीच से रस्सी को छुड़ाकर लाते हैं इस मेले में यही एक आकर्षण का केंद्र होता है इसके बाद रस्साकशी का खेल शुरू होता है और खुशी-खुशी ग्रामीण मेले में घूम कर अपने-अपने घरों को चले जाते हैं।
