किस धातु के बर्तन में बना खाना होता है औषधि समान? आयुर्वेद से जानिए

 

नई दिल्ली: सही बर्तन में खाना बनाना सिर्फ स्वाद बढ़ाने का काम नहीं करता, बल्कि खाने को औषधि जैसा बनाकर शरीर को पोषण और रोगों से सुरक्षा भी देता है। आयुर्वेद के अनुसार, जिस धातु के बर्तन में खाना बनता है, वह भोजन की गुणवत्ता को 30 से 40 प्रतिशत तक प्रभावित करता है। आजकल की मॉडर्न किचन में स्टील, नॉन-स्टिक और एल्युमिनियम बर्तन दिखते हैं, लेकिन स्वास्थ्य के लिए कुछ खास धातुएं सबसे बेहतर मानी गई हैं।

सबसे पहले है पीतल। आयुर्वेद के अनुसार, पीतल भोजन में सत्व बढ़ाता है, पित्त संतुलित करता है और पाचन सुधारता है। पीतल के बर्तन में बनी दाल या हल्की खिचड़ी में प्रोटीन और पोषक तत्वों की बायोअवेलेबिलिटी लगभग 30 प्रतिशत तक बेहतर होती है। यही कारण है कि पुराने समय में हर घर में दाल पीतल के भगोने में बनाई जाती थी। पीतल से बने बर्तन दाल, सब्जी और कढ़ी बनाने के लिए सर्वोत्तम हैं।

दूसरा है कांसा। इसे रोग प्रतिरोधक और पाचन सुधारने वाला धातु माना गया है। कांसा त्रिदोष-नाशक होता है और वात-पित्त को संतुलित करता है। इसके थालियों और कटोरियों में रखा खाना अधिक समय तक सुरक्षित रहता है। शोधों में पाया गया है कि कांसे की थाली में खाना खाने से जठराग्नि बढ़ती है और हीमोग्लोबिन में सुधार होता है।

मिट्टी के बर्तन भी बहुत उपयोगी हैं। इनमें खाना धीमी आंच पर पकता है, जिससे पोषक तत्व सुरक्षित रहते हैं और भोजन हल्का अल्कलाइन बनता है। दाल, खिचड़ी, बिरयानी और दही बनाने के लिए मिट्टी के बर्तन सर्वोत्तम हैं। दही में प्रोबायोटिक्स की मात्रा मिट्टी के बर्तन में सबसे अधिक पाई जाती है।

लोहे के बर्तन आयरन की प्राकृतिक पूर्ति देते हैं। आयुर्वेद में लोहमय पका भोजन रक्तवर्धक माना गया है। लोहे की कड़ाही में पकी पालक या दाल में 8 से 10 मिलीग्राम अतिरिक्त आयरन मिलता है, जो किसी सप्लीमेंट से भी अधिक बायोअवेलेबल होता है। यह विशेष रूप से महिलाओं में हीमोग्लोबिन सुधारने में मदद करता है।

तांबे के बर्तन का उपयोग मुख्य रूप से पानी शुद्ध करने के लिए किया जाता है। तांबे का जल पाचन और लिवर डिटॉक्स के लिए उत्तम होता है। कांसे और तांबे के बर्तनों में रखा पानी 99 प्रतिशत माइक्रोऑर्गेनिज्म को नष्ट कर देता है। इसके अलावा, कुछ धातुओं से बचना चाहिए, जैसे एल्युमिनियम, नॉन-स्टिक और सस्ता स्टील।

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