देहरादून: उत्तराखंड के तमाम हिस्सों से जबरन या फिर प्रलोभन देकर धर्मांतरण के मामले कई बार सामने आ चुके हैं. जिसको देखते हुए साल 2018 में तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने उत्तराखंड में धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम, 2018 को लागू किया था. इसके बाद साल 2022 में धामी सरकार ने इस अधिनियम में संशोधन करते हुए कानून को और अधिक सख्त किया. वर्तमान परिस्थितियों खासकर डिजिटलाइजेशन के इस दौर में डिजिटल माध्यम का इस्तेमाल काफी अधिक बढ़ गया है. जिसको देखते हुए राज्य सरकार ने साल 2025 में अधिनियम में एक बार फिर संशोधन कर दिया है.
उत्तराखंड राज्य में पिछले कुछ सालों से लगातार बढ़ रहे धर्मांतरण के मामले को देखते हुए धामी सरकार ने कानून को और अधिक सख्त करने का निर्णय लिया था. साथ ही डिजिटल माध्यम से धर्मांतरण कराने वालों पर कानूनी शिकंजा कसने पर भी जोर दिया था. जिसके तहत उत्तराखंड धर्म स्वतंत्रता एवं विधि विरुद्ध धर्म परिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2018 में एक बार फिर संशोधन करने का निर्णय लिया गया. 13 अगस्त को हुई धामी मंत्रिमंडल की बैठक के दौरान इसे मंजूरी दे दी गई. अधिनियम में किए गए संशोधन के तहत कानून को और अधिक सख्त कर दिया गया है. संशोधन के साथ ही न सिर्फ इसमें अधिकतम सजा का प्रावधान आजीवन कारावास किया गया है बल्कि जमाने की राशि को 10 लाख तक बढ़ाने के साथ ही संपत्ति के कुर्क करने का भी प्रावधान किया गया है.
उत्तराखंड धर्म स्वतंत्रता एवं विधि विरुद्ध धर्म परिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2018 में संशोधन किए जाने संबंधित प्रस्ताव पर 13 अगस्त को मंत्रिमंडल की मुहर लगी. इसके बाद विधानसभा मानसून सत्र के दौरान 19 अगस्त को सदन के पटल पर इस संशोधित विधेयक को रखा गया. 20 अगस्त को विधानसभा सत्र से इस विधेयक को पारित कर दिया गया. दरअसल, साल 2018 में उत्तराखंड में धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम, 2018 को लागू किया गया था. जिसका मुख्य उद्देश्य था कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25, 26, 27 और 28 में दिए गए धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के तहत हर धर्म के महत्व को समान रूप से बेहतर करना था.
धामी सरकार ने “उत्तराखंड धर्म स्वतंत्रता एवं विधि विरुद्ध धर्म परिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2018 में एक बार फिर संशोधन किया है. जिसके तहत अब डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए धर्म परिवर्तन कराने वालों पर भी कानून का शिकंजा कसा जा सकेगा. पहले से ही राज्य में लागू धर्मांतरण कानून को सरकार ने अब और सख्त कर दिया है. जिसके तहत कोई गिफ्ट, पारितोष, आसान धन, भौतिक लाभ, विवाह करने का वचन, बेहतर जीवन शैली, एक धर्म का दूसरे के खिलाफ महिमामंडन करना भी अपराध की श्रेणी में रखा गया है. इस कानून के तहत अधिकतम सजा को 10 साल से बढ़कर 14 साल या फिर आजीवन कारावास तक कर दिया गया है. साथ ही जुर्माने की राशि 50 हज़ार से बढ़ाकर अधिकतम 10 लाख रुपए कर दी गई है.
उत्तराखंड धर्म स्वतंत्रता एवं विधि विरुद्ध धर्म परिवर्तन प्रतिषेध (संशोधन) विधेयक, 2025 की खास बात ये है कि धर्म परिवर्तन जैसा अपराध करके अर्जित की गई अपराधियों की संपत्तियों को भी कुर्क करने का प्रावधान किया गया है. इसके अधिकार जिलाधिकारी को दिए गए हैं. इसके साथ ही पीड़ितों को कानूनी सहायता, रहने की जगह, भरण-पोषण, चिकित्सा समेत अन्य जरूरी सुविधाएं दी जाएंगी. हालांकि, पीड़ितों का नाम और पहचान को गुप्त रखा जाएगा. सरकार ने निर्णय लिए है कि इसके लिए एक विशेष योजना भी बनाएगी, ताकि पीड़ितों को तत्काल मदद उपलब्ध हो सके.
उत्तराखंड धर्म स्वतंत्रता एवं विधि विरुद्ध धर्म परिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2018 की धारा 2 में संशोधन किया गया है. जिसके तहत डिजिटल ढंग शब्द को शामिल किया गया है. इसके साथ ही धारा 3 में उपधारा 2 के स्पष्टीकरण के बाद तीन उपधाराए जोड़ी गई हैं. जिसके तहत, कोई भी व्यक्ति डिजिटल ढंग सहित किन्हीं साधनों के माध्यम से ऐसे धर्म परिवर्तन के लिए नहीं उकसाएगा या षड्यन्त्र नहीं करेगा, कोई भी व्यक्ति विवाह के आशय से अपना धर्म नहीं छिपाएगा. कोई भी व्यक्ति छदम पहचान का प्रयोग नहीं करेगा, धार्मिक, सामाजिक या अन्य पहचान का दुरुपयोग नहीं करेगा. सार्वजनिक भावनाओं को आहत नहीं करेगा, अनुचित लाभ प्राप्त करने के लिए धोखाधड़ी नहीं करेगा.
धारा 4 में किए गए संशोधन के तहत, इस अधिनियम के उपबन्धों के उल्लंघन से सम्बन्धित कोई प्रथम सूचना रिपोर्ट किसी भी व्यक्ति द्वारा दाखिल की जा सकती है. ऐसी सूचना देने की रीति वही होगी जैसी भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (अधिनियम संख्या 46 सन् 2023) के अध्याय 13 में की गयी है. हालांकि, धामी मंत्रिमंडल से उत्तराखंड धर्म स्वतंत्रता एवं विधि विरुद्ध धर्म परिवर्तन प्रतिषेध (संशोधन) विधेयक, 2025 को मंजूरी मिलने के बाद विधानसभा मानसून सत्र में भी पारित हो गया है. ऐसे में राज्यपाल की मंजूरी के लिए इस विधेयक को राजभवन भेजा जाएगा. जिसके बाद ये अधिनियम के रूप में लागू हो जाएगा.
