बिहार की जनता को क्यों नहीं लुभा पाया तेजस्वी का घर-घर सरकारी नौकरी वाला वादा

नई दिल्ली: बिहार विधानसभा चुनाव के रुझान और परिणाम अब साफ दिखा रहे हैं कि महागठबंधन के दलों और तेजस्वी यादव के वादों पर बिहार की जनता ने भरोसा नहीं दिखाया। तेजस्वी का घर-घर सरकारी नौकरी वाला प्रण भी उनकी जीत में प्राण नहीं फूंक सका। महागठबंधन का ऐसा हश्र होगा ये तो तेजस्वी यादव ने भी नहीं सोचा होगा, जहां राजद हाफ, सन ऑफ मल्लाह साफ, कांग्रेस को पंजे की अंगुलियों के बराबर भी सीट नहीं मिलेगी। बिहार में महिला मतदाताओं का मतदान प्रतिशत 71.78 रहा, जो पुरुषों के 62.98 प्रतिशत से काफी ज्यादा था। महिलाओं की इस लोकतंत्र के पर्व में अभूतपूर्व भागीदारी ने नीतीश कुमार की सरकार के पक्ष में पलड़ा झुका दिया। आखिर महिलाओं ने तेजस्वी के घर-घर सरकारी नौकरी के साथ ‘माई बहिन मान योजना’ तक को क्यों स्वीकार नहीं किया, यह जानना जरूरी है। दरअसल, तेजस्वी यादव के वादे लोक लुभावने तो थे, लेकिन बिहार जैसे राजनीतिक चेतना से भरे राज्य की जनता की समझ के अनुसार ये केवल हवा-हवाई चुनावी वादे थे, जिस पर भरोसा करना मुमकिन नहीं था। तेजस्वी ने हर घर सरकारी नौकरी, पेंशन, महिला सशक्तीकरण जैसे बड़े वादे किए, लेकिन इसके लिए फंड कहां से आएगा, इसका ब्लूप्रिंट क्या होगा और इसकी टाइमलाइन क्या होगी, इस बारे में कुछ भी ठोस जनता के साथ साझा नहीं किया। तेजस्वी तो खुद कई बार मीडिया के सामने यह कहते दिखे कि इसका ब्लूप्रिंट आएगा, लेकिन चुनाव खत्म होने तक वह नहीं आ पाया। वहीं, एनडीए ने तेजस्वी के इन दावों को हवा-हवाई बताकर चुनावों के दौरान खूब भुनाया। नतीजा यह रहा कि वोटर लामबंद हुए और परिणाम सबके सामने है। इस चुनाव के दौरान महागठबंधन खेमे के दलों के बीच का सिर-फुटौव्वल भी जनता को नहीं भाया। सीटों के बंटवारे में देरी और फिर सीट बंटवारे के बाद राजद ही राजद का केवल नजर आना, जनता को लुभाने में कामयाब नहीं रहा। सीट बंटवारे के बाद भी कई सीटों पर महागठबंधन के दल एक-दूसरे के सामने प्रत्याशी उतारने से नहीं कतराए। अंदरखाने राजद, कांग्रेस और वाम दलों के बीच भरोसे की कमी जनता को साफ दिखी। सीट बंटवारे के विवाद ने भी महागठबंधन को जमीन पर खूब कमजोर किया। घोषणापत्र का नाम ‘तेजस्वी प्रण’ भी शायद जनता को नहीं भाया और फिर जनता के बीच बिना सहयोगी दलों के होते हुए सीएम और डिप्टी सीएम के चेहरे की घोषणा, जनता इन भीतरखाने चल रहे विवाद को समझ गई थी। जंगलराज की बात से भागते तेजस्वी का यह शब्द पीछा नहीं छोड़ पाया। ऊपर से पार्टी के समर्थकों का पूरे बिहार में व्यवहार भी जनता को रास नहीं आया। लोग यह मानने लगे थे कि तेजस्वी के सत्ता में आते ही, जो आवाज अभी धीरे-धीरे सुर पकड़ रही है, यह ज्यादा तेज होने वाली है और फिर कोई भी 1990-2000 के बिहार की कल्पना करना नहीं चाहता है। इसके साथ आरजेडी उम्मीदवारों के मंच से दबंगई के अंदाज में ‘कट्टे वाला’ चुनाव प्रचार भी लोगों को पसंद नहीं आया। 144 में से 52 सीटों पर यादव उम्मीदवार उतारना भी तेजस्वी के लिए नुकसान का सौदा बना। उनकी छवि जनता के बीच ‘यादव एकीकरण’ वाली बन गई। ऐसे में गैर-यादव वोट बैंक-अगड़े और अति पिछड़े- महागठबंधन से दूर हो गए। दूसरी तरफ एनडीए ने सीट शेयरिंग और प्रचार में एकजुटता दिखाई और नीतीश कुमार और पीएम नरेंद्र मोदी के वादे जनता को पसंद आए। पूरे बिहार में वोटरों ने मोदी-नीतीश की जोड़ी पर भरोसा जताया। तेजस्वी लालू की राह पर तो निकले थे लेकिन पार्टी के पोस्टर पर ‘नई पीढ़ी’ का संदेश देने की कोशिश में लालू यादव की तस्वीर छोटी कर दी। जिससे राजद के कार्यकर्ताओं में भी असंतोष साफ दिखा। दूसरी तरफ तेजस्वी यादव के चुनाव प्रचार से लालू की दूरी भी पार्टी के लिए नुकसानदायक रही। लालू को मंच पर नहीं देखकर राजद के समर्थक निराश दिखे। वहीं, परिवार में दोनों भाई तेज प्रताप यादव और तेजस्वी यादव के साथ बहनों के बीच भी कलह ने पार्टी समर्थकों को खेमे में बांट दिया।

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