आपदा-सक्षम विकास की ओर कदम: हरिद्वार की मनसा देवी पहाड़ियों पर जुटे अंतरराष्ट्रीय भूवैज्ञानिक

हरिद्वार/देहरादून: हिमालयी क्षेत्रों में आपदा प्रबंधन की चुनौतियों से निपटने और सुरक्षित भविष्य की नींव रखने के लिए उत्तराखंड में एक बड़ी कवायद शुरू हुई है। उत्तराखंड भूस्खलन न्यूनीकरण एवं प्रबंधन केंद्र (ULMMC) द्वारा आयोजित पांच दिवसीय अंतरराष्ट्रीय प्रशिक्षण कार्यक्रम के तहत आज देश-विदेश के वैज्ञानिकों ने हरिद्वार स्थित मनसा देवी की पहाड़ियों के भूस्खलन प्रभावित क्षेत्रों का गहन तकनीकी अध्ययन किया।

अंतरराष्ट्रीय सहयोग और विशेषज्ञता

विश्व बैंक और नॉर्वेजियन जियोटेक्निकल इंस्टीट्यूट (NGI) के सहयोग से आयोजित इस कार्यक्रम में न केवल भारत, बल्कि नेपाल और भूटान के भूवैज्ञानिक भी हिस्सा ले रहे हैं। यह संगम हिंदू कुश-हिमालय क्षेत्र में आपदा प्रतिरोधकता (Resilience) को मजबूत करने के लिए एक साझा मंच प्रदान कर रहा है।

फील्ड विजिट: धरातल पर तकनीकी जांच

विशेषज्ञों के दल ने मनसा देवी क्षेत्र में चल रहे विभिन्न तकनीकी कार्यों का बारीकी से निरीक्षण किया:

  • ढाल स्थिरीकरण (Slope Stabilization): पहाड़ियों के ढाल को सुरक्षित रखने के लिए किए जा रहे कार्यों का अवलोकन।

  • भू-अन्वेषण और ड्रिलिंग: मिट्टी और चट्टानों की आंतरिक स्थिति को समझने के लिए की जा रही ड्रिलिंग प्रक्रियाओं का अध्ययन।

  • जल निकासी व्यवस्था: विशेषज्ञों ने माना कि पहाड़ों में जल निकासी (Drainage) का सही प्रबंधन भूस्खलन रोकने की सबसे प्रभावी कुंजी है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण और भविष्य की रणनीति

सचिव आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास, श्री विनोद कुमार सुमन के अनुसार, इस फील्ड विजिट का मुख्य उद्देश्य सैद्धांतिक ज्ञान को व्यावहारिक धरातल पर परखना है। बैठक और भ्रमण के दौरान कुछ प्रमुख बिंदुओं पर चर्चा की गई:

  1. स्थल-विशिष्ट उपचार (Site-Specific Treatment): हर पहाड़ी की संरचना अलग होती है, इसलिए एक ही फॉर्मूला हर जगह लागू नहीं किया जा सकता।

  2. चेतावनी प्रणाली (Early Warning System): भविष्य में भूस्खलन के खतरे को पहले से भांपने के लिए आधुनिक निगरानी उपकरणों की आवश्यकता।

  3. बहु-विभागीय दृष्टिकोण: भूस्खलन रोकने के लिए वन, लोक निर्माण और आपदा प्रबंधन विभागों का आपसी समन्वय अनिवार्य है।

क्षेत्रीय क्षमता का विकास

इस प्रशिक्षण कार्यक्रम का मुख्य लक्ष्य हिमालयी देशों के बीच तकनीकी ज्ञान का आदान-प्रदान करना है। नेपाल और भूटान के प्रतिभागियों की उपस्थिति ने यह स्पष्ट किया कि भूस्खलन एक सीमाहीन समस्या है, जिसका समाधान आपसी सहयोग से ही संभव है।

प्रशिक्षण कार्यक्रम की मुख्य बातें

  • अवधि: 02 फरवरी से 06 फरवरी 2026

  • स्थान: पंडित दीनदयाल उपाध्याय संस्थान, सुद्धोवाला (देहरादून) एवं हरिद्वार।

  • प्रमुख उपस्थित विशेषज्ञ: डॉ. शांतनु सरकार (निदेशक, ULMMC), हाकोन हेयर्डाल, डॉ. जीन-सेबास्टियन लह्यूरू और अन्य अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक।

मनसा देवी की पहाड़ियों पर किया गया यह अध्ययन केवल एक शैक्षणिक भ्रमण नहीं है, बल्कि यह उन हजारों परिवारों की सुरक्षा से जुड़ा है जो इन पहाड़ियों की तलहटी में बसते हैं। वैज्ञानिकों द्वारा जुटाए गए ये आंकड़े भविष्य की “मास्टर प्लान” रणनीति तैयार करने में सहायक होंगे।

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