धामी के सपनों में कैसे फिट होगा उत्तराखंड,युवाओं की घर वापसी होगी?

देहरादून: जब एक व्यक्ति कोई ख्वाब देखता है, तो उसे पूरा करने के लिए दिन रात एक कर देना होता है। शायद इसीलिए कहा जाता है कि आंखों को सपने जरूर देखने चाहिए ताकि उसे पूरा करने के लिए आपके पैर दौड़ लगा सके। भारत का एक बहुत छोटा सा राज्य है उत्तराखंड, जो नया भी है और युवा भी और युवाओं को सपने देखने चाहिए। अच्छी बात ये है कि पिछले 4 बरसों से इस प्रदेश के मुखिया एक युवा हैं और वो भी जम कर सपने देखते हैं। इसी सपनों की कड़ी में एक सपना था उत्तराखंड को आर्थिक तौर पर मजबूत करने का और इसके लिए युवा मुख्यमंत्री ने एक बड़ी पहल की जिसमें दुनिया भर के इनवेस्टर्स आए। लेकिन कहते है ना कि जरूरी नहीं कि जमीन में बोया गया हर बीज एक पलदार वृक्ष का स्वरूप ले ही। इस वैश्विक निवेशक सम्मेलन (8-9 दिसंबर 2023) के दो वर्ष पूरे होते-होते सरकार ने एक बड़ी सफलता हासिल की है।

जहां आमतौर पर सरकार की ज्यादातर योजनाएं धरातल से ऊपर नहीं उठ पाती है वहां अगर धामी सरकार इस विश्वस्तरीय सम्मेलन को करा पाने में सफल हुई जिसमें की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर देश-विदेश के बड़े-बड़े इनवेस्टर्स शामिल हुए जिसमें विभिन्न क्षेत्र (स्वास्थ्य, लॉजिस्टिक्स, उच्च शिक्षा, पर्यटन, फिल्म, उर्जा) में करीब-करीब साढ़े तीन लाख करोड़ के इनवेस्टमेंट (मेमोरेंडा ऑफ अनडस्टैंडिंग) की बात थी और एक लाख करोड़ की ग्राऊंडिंग संभव हो पाई है।

उत्तराखंड सरकार का उद्देश्य जहां एक तरफ उत्तराखंड को भारत का नया इनवेस्टमेंट डेस्टिनेशन बनाना है वहीं इसके नेपथ्य में जाएं तो पता चलता है कि सरकार के लिए पलायन वो कोढ़ बन चुका है जिससे निवटारा पाने का यह रामबाण रोडमैप हो सकता है।

एक आंकड़े के मुताबिक अभी तक हुए इनवेस्टमेंट में करीब 5 से 10 हजार स्थानीय लोग इसका सीधे तौर पर लाभ उठा पाएंगे। निवेशक बेधड़क राज्य में इनवेस्ट कर सके इसके लिए सरकार ने लचीला कानून के साथ साथ पारदर्शिता पर अधिक जोर दिया है।

सरकार जहां एक तरफ इनवेस्टर्स को प्रदेश में इनवेस्ट करने के लिए सहूलियत मुहैया करा रही है वहीं प्रदेश में किसी भी तरह के भ्रष्टाचार से निबटने के लिए सरकार ने जीरो टोलरेस की नीति भी अपनाई है। चाहे अधिकारी हों या नौकरशाह, भ्रष्टाचार में सम्मिलित होने की भनक मात्र से राज्य सरकार कड़ी कार्रवाई कर रही है। मुख्यमंत्री हर संभव प्रदेश की छवि को साफ-सुथरा रखने की कोशिश करते हैं। इस बीच पिछले 4 सालों में सरकार ने केंद्र की मदद से कई योजनाएं प्रदेश में लागू की हैं जिससे आधी आबादी को ठोस फायदा पहुंचा है।

आज उत्तराखंड में महिलाएं स्वरोजगार से काफी लाभान्वित हुई हैं। कई गांवों में जहां महिलाएं होम स्टे के जरिये घर बैठे कमा रही हैं और दूसरे गांवों के लिए भी मिसाल बन रही हैं वहीं लखपति दीदी जैसी योजनाओं के माध्यम से महिलाएं कुटीर उद्योग चला रही हैं।

दिल्ली टू देहरादून ऑल वेदर रोड भी इसी कड़ी का हिस्सा है। पहले जहां पहाड़ में यात्रा करना बेहद मुश्किलों भरा होता था वहीं आज घंटों में सफर तय किया जा सकता है। इसका जीता-जागता उदाहरण है चार-धाम यात्रा में भक्तों की बेतहाशा वृद्धि। धामी सरकार ने इनवेस्टर समिट में खुद भी कम दौड़ नहीं लगाई है। वो इनवेस्टर्स को मनाने और रिझाने के लिए लंदन और दुबई तक स्वयं गए और परिणाम स्वरूप इन देशों के उद्योगपतियों के अलावा स्पेन, क्यूबा, ग्रीस, आस्टा, जापान, साऊदी अरब, नेपाल से भी उद्यगपति सम्मेलन नजर आए। बड़ी बात ये है कि सरकार ने सिर्फ इनवेस्टर समिट कराके झंडे नहीं गाड़े, धरातल पर इसे लागू करने में भी सफलता हासिल की है।

सरकारी आंकड़े के के मुताबिक तीन लाख, सत्तावन हजार, छह सौ तिरानवे करोड़ का एमओयू साइन हुआ जिनमें करीब-करीब एक लाख करोड़ के एमओयू की ग्राऊंडिग हो चुकी है और इस हिसाब से करीब-करीब 80 हजार स्थानीय लोगों को रोजगार उपलब्ध हुआ है। जिनमें उर्जा के क्षेत्र में करीब हजार लोगों को रोजगार मिले हैं।

यानी कि उत्तराखंड की साढ़े 8 हजार, इंडस्ट्रीज में 44 हजार, टूरिज्म में 46 सौ, हाईयर एडुकेशन में 44 सौ तथा अन्य क्षेत्र में 14 धामी सरकार ने जो वादा किया था उसमें खरा उत्तरने की कोशिश की है और देर-सबेर इसके परिणाम भी सामने आ रहे हैं। लेकिन सवाल अब भी वही है कि क्या जो लोग पलायन कर चुके हैं उनके लिए धामी की ये कारीगरी कारगर हो पाएगी।

क्या प्रदेश छोड़कर परदेश जा चुके युवा यहां वापसी का मन बनाएंगे और अगर युवाओं की वापसी में किसी तरह की शिथिलता दिखती है और वे वापसी का मन नहीं बना पाते हैं तो धामी क्या करेंगे? प्रदेश को हर तरह से सिक्योर करने में लगे हैं चाहे वो भ्रष्टाचार हो कि क्राइम।

हालांकि, किसी बाहरी कंपनी या इंडस्ट्री या किसी भी अन्य तरीके के इनवेस्टमेंट की बात करें तो ये भी जगजाहिर है कि उन्हें भ्रष्टाचार और क्राइम वाले स्थान पर इनवेस्ट करने में दिक्कत होती है तो इस लिहाज से भी धामी का ये सारगर्भित कदम माना जाएगा। आने वाले समय में प्रदेश में चुनाव भी है ऐसे में धामी पर दबाव तो काफी रहेगा, देखने वाली बात ये होगी वो इन सब के बीच अपने सपनों को साकार करने के लिए और क्या करते हैं और क्या उनके सपनों के उत्तराखंड में युवाओं की घर वापसी होगी?

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