नई दिल्ली, 10 दिसंबर 2025
एक चौंकाने वाली नई रिपोर्ट के अनुसार भारत में लोगों का प्रोटीन इंटेक भले ही संख्यात्मक रूप से ठीक दिखता हो, लेकिन उसकी गुणवत्ता बेहद खराब हो चुकी है। करीब **50% प्रोटीन अब सिर्फ अनाज (चावल, गेहूं, सूजी, मैदा)** से आ रहा है, जबकि इनमें प्रोटीन की मात्रा और गुणवत्ता दोनों ही कम होती है।
मुख्य निष्कर्ष एक नजर में
– औसत भारतीय प्रतिदिन **55.6 ग्राम** प्रोटीन ले रहा है, लेकिन इसका **आधा हिस्सा अनाजों** से
– दाल, दूध, अंडे, मांस-मछली जैसे उच्च गुणवत्ता वाले प्रोटीन स्रोतों की खपत लगातार घट रही
– सब्जियां-फल भी कम हो रहे, तेल-नमक-चीनी का इस्तेमाल बढ़ा
– मोटे अनाज (ज्वार, बाजरा, रागी) की खपत पिछले 10 साल में **लगभग 40% गिरी**
गरीब vs अमीर: खाने की खाई चौड़ी हुई
रिपोर्ट में सबसे दर्दनाक तथ्य खपत में आ रही असमानता का है:
| पैरामीटर | सबसे गरीब 20% लोग (सप्ताह में) | सबसे अमीर 20% लोग (सप्ताह में) |
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| दूध | मात्र 2-3 गिलास | 8-9 गिलास |
| फल (केले के बराबर) | सिर्फ 2 केले | 8-10 केले |
| फैट का सेवन | कम आय वालों से आधा | लगभग दोगुना |
“यह एक मूक संकट है” – शोधकर्ता
सीईईडब्ल्यू के शोधकर्ता **अपूर्व खंडेलवाल** ने इसे “**साइलेंट क्राइसिस**” करार दिया है। उन्होंने कहा:
> “लो-क्वालिटी प्रोटीन पर ज्यादा भरोसा, अनाज और तेल से अतिरिक्त कैलोरी, और पोषक तत्वों से भरपूर खाद्य पदार्थों की कम खपत – यह भारत की खाद्य प्रणाली का वर्तमान सच है। फोर्क से फार्म तक विविधता को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाना होगा।”
पीडीएस और सब्सिडी का साइड इफेक्ट
रिपोर्ट बताती है कि सस्ते चावल-गेहूं की भारी उपलब्धता (खासकर PDS के जरिए) ने लोगों का आहार और ज्यादा अनाज-केन्द्रित बना दिया है:
– कार्बोहाइड्रेट का **तीन-चौथाई हिस्सा** अनाज से
– अनाज का सेवन RDA से **1.5 गुना ज्यादा**
– पिछले 10 साल में फैट की अधिकता वाले घरों का हिस्सा **दोगुना** हो गया
स्टडी की सिफारिशें
1. PDS, मिड-डे मील, आंगनवाड़ी में सिर्फ चावल-गेहूं नहीं, बल्कि **मोटे अनाज, दाल, दूध, अंडे, फल-सब्जियां** शामिल करें
2. पोषण जागरूकता अभियान तेज करें
3. खाद्य सब्सिडी नीति में पोषण-आधारित विविधता लाएं
**स्रोत:** काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (CEEW) की रिपोर्ट, आधार – NSSO हाउसहोल्ड कंजम्पशन एक्सपेंडिचर सर्वे 2023-24
संख्याओं में प्रोटीन पर्याप्त दिख रहा है, लेकिन गुणवत्ता के अभाव में भारत कुपोषण के एक नए दौर में प्रवेश कर चुका है – जिसे अभी तक हम नजरअंदाज करते आए हैं।
