अंतर्कलह, बयानों और आंकड़ों के भंवर में उत्तराखंड कांग्रेस.. हार की सेंचुरी बनाने राहुल आ रहे हैं उत्तराखंड
पिछले दो दशकों में राहुल गांधी के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस लगभग 99 चुनाव हार चुकी है और वह चुनावी हार का ‘शतक’ (सेंचुरी) लगाने के बेहद करीब पहुंच गई है। कांग्रेस की राजनीति में राहुल गांधी का सफर काफी लंबा रहा है, लेकिन यह सफर ज्यादातर चुनावी हारों से घिरा रहा है. अब तक वे देशभर में 99 चुनाव हार चुके हैं, और हार का ‘शतक’ बनाने से बस एक कदम दूर हैं. अगर राज्यों और सालों के हिसाब से उनके चुनावी नतीजों को देखें, तो तस्वीर काफी चिंताजनक नजर आती है. बार-बार मिल रही यह नाकामयाबी न केवल राहुल गांधी के करियर पर सवाल उठाती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि उनके नेतृत्व में कांग्रेस के लिए आगे की राह कितनी मुश्किल भरी है.
ऐसे में राहुल गांधी एक बार फिर चुनावी समर में उतर रहे हैं और 2027 में उत्तराखंड में होने वाले चुनाव के लिए पार्टी संगठन के वरिष्ठ नेताओं, जिला अध्यक्षों, विधायकों और पदाधिकारियों के साथ बैठक कर उनका मनोबल बढाएंगे. उत्तराखंड की राजनीति में कभी एक मजबूत स्तंभ रही कांग्रेस आज अपने वजूद को बचाने के लिए कड़ा संघर्ष कर रही है।
राज्य स्थापना के बाद शुरुआती दशकों में सत्ता की बराबर की हिस्सेदार रही यह पार्टी आज लगातार मिल रही हार और गंभीर आंतरिक कलह के कारण हाशिए पर खड़ी नजर आती है।वर्ष 2027 में होने वाले आगामी विधानसभा चुनावों की आहट के बीच, पार्टी को बाहरी चुनौतियों से ज्यादा अपनी अंदरूनी खींचतान से निपटना पड़ रहा है।
चुनावी आंकड़ों पर अगर गौर किया जाए तो लगातार खिसकता जनाधार यदि पिछले चुनाव परिणामों पर नजर डालें, तो कांग्रेस का ग्राफ लगातार नीचे गिरा है। 2022 विधानसभा चुनाव: 70 सदस्यीय विधानसभा में भाजपा ने 47 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई, जबकि कांग्रेस महज 19 सीटों पर सिमट गई। इस चुनाव में भाजपा को 44.3% और कांग्रेस को 37.9% वोट शेयर मिला था।
लोकसभा चुनाव:राज्य की सभी 5 लोकसभा सीटों (गढ़वाल, टिहरी, अल्मोड़ा, नैनीताल और हरिद्वार) पर कांग्रेस को करारी शिकस्त झेलनी पड़ी और पार्टी खाता भी नहीं खोल सकी।
पंचायत चुनाव: हालांकि, कुछ समय पहले हुए त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों में जिला पंचायत की कुल 358 सीटों में से भाजपा को 216 और कांग्रेस को 113 सीटें मिलीं। हालांकि कांग्रेस ने इसे कुछ हद तक वापसी बताया, लेकिन ब्लॉक प्रमुख और जिला पंचायत अध्यक्ष पदों के स्तर पर संगठन की कमजोरी फिर उजागर हुई।
हालिया घटनाक्रम: अधूरी कार्यकारिणी और सांगठनिक शिथिलतापार्टी की सांगठनिक स्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी (PCC) लंबे समय तक पूर्ण और मजबूत कार्यकारिणी के बिना ही काम करती रही। हाल ही में पार्टी आलाकमान ने गुटबाजी को रोकने और चुनावी तैयारियों को धार देने के लिए 8 जोन का एक नया प्लान तैयार किया है, और संगठन की कमान में संतुलन बनाने की कोशिशें तेज की हैं। इसके साथ ही, हाल ही में प्रदेश प्रभारी कुमारी सैलजा के गढ़वाल दौरों के दौरान भी गुटीय खींचतान और साजिशों की खबरें मीडिया की सुर्खियां बनीं, जो यह बताती हैं कि धरातल पर अभी भी सब कुछ ठीक नहीं है।
नेताओं के तीखे बयान : जगजाहिर होती आपसी रारपार्टी के भीतर चल रही जंग अक्सर बयानों के जरिए सार्वजनिक मंचों पर आ जाती है। उत्तराखंड कांग्रेस के दो दिग्गज नेताओं के बीच का मनमुटाव पार्टी की अंदरूनी कमजोरी को साफ दर्शाता है:
*हरीश रावत का दर्द* : पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने सोशल मीडिया और सार्वजनिक मंचों पर कई बार खुलकर अपनी ही पार्टी के सांगठनिक ढांचे पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने एक बार कहा था कि “चुनाव के समुद्र में तैरते समय सांगठनिक ढांचा सहयोग करने के बजाय या तो मुंह फेर लेता है या नकारात्मक भूमिका निभाता है। संगठन ने मेरे हाथ बांध दिए हैं।”हरक सिंह रावत का पलटवार: दूसरी ओर, वरिष्ठ नेता
*हरक सिंह रावत ने हार का ठीकरा फोड़ते हुए बयान दिया* कि “राजनीति परिणामों की होती है, जो जीतता है वही सिकंदर होता है। नेताओं को ‘मेरा और तेरा’ करने के बजाय जिताऊ उम्मीदवारों पर ध्यान देना चाहिए था।” इसके जवाब में हरीश रावत ने भी तंज कसते हुए कहा था कि “अगर मैं हस्तक्षेप न करता तो हरक सिंह की कांग्रेस में वापसी भी न होती।”नेतृत्व पर संशय: 2027 के चुनाव में कांग्रेस का चेहरा कौन होगा, इसे लेकर भी वरिष्ठ नेताओं के बीच अभी से खींचतान और बयानबाजी का दौर शुरू हो चुका है।
मुख्य विपक्षी दल होने के नाते कांग्रेस कई अवसरों को एक बड़े जन-आंदोलन में बदलने में नाकाम रही है। सदन के भीतर भी बजट सत्र और विशेष सत्रों के दौरान मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार कांग्रेस के इस बिखराव पर जमकर हमलावर रही है।
आंकड़े और मौजूदा घटनाक्रम साफ गवाही देते हैं कि कांग्रेस जब तक अपने सीनियर नेताओं की आपसी बयानबाजी और गुटबाजी को नहीं रोकेगी, तब तक कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा फूंकना असंभव होगा। 2027 का रण नजदीक है और यदि कांग्रेस को राज्य में अपनी प्रासंगिकता बचानी है, तो उसे ‘नेताओं की पार्टी’ के बजाय ‘कार्यकर्ताओं की पार्टी’ बनकर सड़कों पर उतरना होगा।
