देहरादून। उत्तराखंड ने शिक्षा और सामाजिक विकास के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक मील का पत्थर हासिल किया है। राज्य के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) गुरमीत सिंह द्वारा अनुमोदित आंकड़ों के अनुसार, उत्तराखंड अब आधिकारिक तौर पर भारत का छठा ‘पूर्ण साक्षर राज्य’ बन गया है। राज्य ने मात्र दो वर्षों के भीतर अपनी साक्षरता दर में रिकॉर्ड बढ़ोतरी करते हुए 98.7 प्रतिशत का शानदार आंकड़ा छू लिया है।
यह अभूतपूर्व सफलता केंद्र सरकार के ‘उल्लास – नव भारत साक्षरता कार्यक्रम’ (ULLAS – Understanding Lifelong Learning for All in Society) के प्रभावी क्रियान्वयन की बदौलत मिली है। उत्तराखंड ने 15 वर्ष से अधिक आयु के लोगों में न्यूनतम 95% वयस्क साक्षरता के केंद्रीय मानक को न सिर्फ हासिल किया, बल्कि उससे कहीं आगे निकल गया है।
दो साल में 14.9% की रिकॉर्ड छलांग
शिक्षा निदेशालय द्वारा जारी आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि वर्ष 2023-24 में राज्य की साक्षरता दर 83.8 प्रतिशत दर्ज की गई थी। इसके बाद सरकार और शिक्षा विभाग के विशेष अभियानों के कारण मात्र दो वर्षों में साक्षरता दर में 14.9 प्रतिशत की उल्लेखनीय वृद्धिदर्ज की गई, जो देश के किसी भी राज्य के लिए एक मिसाल है।
कैसे हासिल हुआ यह लक्ष्य?
राज्य में इस मिशन को कामयाब बनाने के लिए सबसे पहले ‘उल्लास’ कार्यक्रम के तहत जमीनी स्तर पर व्यापक सर्वेक्षण किया गया। इस सर्वे के जरिए प्रदेश के कोने-कोने में निरक्षर व्यक्तियों की पहचान की गई और उन्हें शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए विशेष कक्षाएं और संसाधन उपलब्ध कराए गए।
केंद्रीय मानकों को पछाड़ा
सात वर्ष से अधिक आयु की उत्तराखंड की कुल आबादी लगभग 1 करोड़ 23 लाख 46 हजार आंकी गई है।
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केंद्रीय मानक की शर्त: पूर्ण साक्षर राज्य का दर्जा पाने के लिए राज्य में निरक्षरों की संख्या 5 लाख 11 हजार 731 से कम होनी चाहिए थी।
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उत्तराखंड की वास्तविक स्थिति: विस्तृत सर्वे के बाद राज्य में केवल 1 लाख 31 हजार 986 व्यक्ति ही निरक्षर पाए गए, जो केंद्रीय लक्ष्य से बेहद कम है।
इसी शानदार प्रदर्शन के आधार पर उत्तराखंड की साक्षरता दर 98.7% आंकी गई है, जो देवभूमि के लिए एक गौरवपूर्ण उपलब्धि है। इस सफलता से राज्य में रोजगार, कौशल विकास और डिजिटल साक्षरता के नए रास्ते खुलेंगे।
उल्लास (ULLAS) क्या है?
यह केंद्र सरकार का एक विशेष विजन है जिसका उद्देश्य समाज के उन वयस्कों (15 वर्ष या उससे अधिक) को बुनियादी शिक्षा, डिजिटल साक्षरता और जीवन जीने के महत्वपूर्ण कौशल सिखाना है, जो किसी कारणवश बचपन में स्कूली शिक्षा से वंचित रह गए थे।
