गोरखपुर लौट चुके थे योगी, तभी आया अमित शाह का फोन और बदल गया यूपी का इतिहास; जानिए सीएम बनने की वो अनसुनी कहानी

नई दिल्ली, 4 जून: उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ—एक ऐसा नाम जिसके सामने आते ही आज बड़े से बड़े गुंडे-माफियाओं के पैर कांपने लगते हैं। जिनकी ‘योगी नीति’ और ‘यूपी मॉडल’ की गूंज आज पूरे देश में है और जिसे हर राज्य अपनाना चाहता है। एक संन्यासी से लेकर देश के सबसे शक्तिशाली मुख्यमंत्री बनने तक का योगी आदित्यनाथ का सफर बेहद दिलचस्प और चमत्कारी रहा है। 5 जून 1972 को उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल के पंचूर गांव में अजय सिंह बिष्ट के रूप में जन्मे योगी आदित्यनाथ के राजनीतिक जीवन में कई ऐसे मोड़ आए, जिन्होंने सब कुछ बदल कर रख दिया।

छात्र राजनीति से शुरुआत: जब कॉमरेड बनते-बनते रह गए अजय सिंह बिष्ट

योगी आदित्यनाथ का मन स्कूल के दिनों से ही राष्ट्रनीति और सियासत की तरफ आकर्षित होने लगा था। वह अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) के सदस्य बने। छात्रसंघ चुनाव के दौरान उन्होंने सचिव पद के लिए दावेदारी पेश की, लेकिन टिकट न मिलने पर वह निर्दलीय ही मैदान में उतर गए। हालांकि, वह यह चुनाव हार गए।

दिलचस्प बात यह है कि उस समय उनकी बहन के देवर (रिश्ते में जीजा) वामपंथी छात्र संगठन एसएफआई (SFI) के सक्रिय सदस्य थे और वह चाहते थे कि युवा अजय सिंह बिष्ट कम्युनिस्ट विचारधारा से जुड़कर एसएफआई ज्वाइन कर लें। लेकिन इसी बीच अजय की मुलाकात एबीवीपी कार्यकर्ता प्रमोद रावत से हुई और उनके प्रभाव में आकर उन्होंने विद्यार्थी परिषद के साथ ही आगे बढ़ने का फैसला किया।

जब पीएमओ ने स्पेन दौरे से काट दिया था सांसद योगी का नाम

साल 2017 में योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने की कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट जैसी है। महीनों की हाड़-तोड़ मेहनत और प्रदेशभर में धुआंधार रैलियां करने के बाद जब मतदान खत्म हुआ, तो गोरखपुर के तत्कालीन सांसद योगी आदित्यनाथ एक हफ्ते का ब्रेक लेना चाहते थे। उसी दौरान विदेश मंत्रालय की एक टीम स्पेन जाने वाली थी और योगी जी को भी इसमें शामिल होने का न्योता मिला था। लेकिन ऐन वक्त पर प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) ने इस दौरे से योगी आदित्यनाथ का नाम हटा दिया। तब योगी जी को बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि नियति ने उनके लिए क्या तय कर रखा है।

सुषमा स्वराज का फोन और अमित शाह का वो चार्टर्ड प्लेन

11 मार्च 2017 को जब उत्तर प्रदेश चुनाव के नतीजे आए, तो भाजपा ने सहयोगियों के साथ मिलकर 403 में से 325 सीटों पर ऐतिहासिक और प्रचंड बहुमत हासिल किया। नतीजों के बाद लखनऊ से लेकर दिल्ली तक मुख्यमंत्री के चेहरे को लेकर कई बड़े नामों की चर्चा चल रही थी, लेकिन उस रेस में योगी आदित्यनाथ का नाम बहुत पीछे था।

योगी आदित्यनाथ दिल्ली से गोरखपुर निकलने की तैयारी में थे कि तभी उनके पास तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का फोन आया, जिन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक गुप्त संदेश उन तक पहुंचाया। इसके ठीक बाद, भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का फोन आया। अमित शाह ने योगी जी को तुरंत दिल्ली आने को कहा और उनके लिए एक विशेष चार्टर्ड प्लेन की व्यवस्था भी कर दी।

18 मार्च की सुबह और अमित शाह का वो ‘सीक्रेट’

18 मार्च 2017 की सुबह दिल्ली में अमित शाह के आवास पर योगी आदित्यनाथ की एक बेहद महत्वपूर्ण मुलाकात हुई। इसी बैठक में अमित शाह ने योगी जी को साफ बता दिया कि वह उत्तर प्रदेश के अगले मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं। हालांकि, शाह ने उनसे इस बात को विधायक दल की बैठक होने तक पूरी तरह गुप्त रखने को कहा था। इसके बाद लखनऊ में हुई भाजपा विधायक दल की बैठक में जैसे ही योगी आदित्यनाथ के नाम की घोषणा हुई, पूरा देश चौंक गया। इस पूरी कहानी का खुलासा खुद सीएम योगी ने एक इंटरव्यू में किया था।

कुछ मीडिया रिपोर्टों का यह भी दावा है कि चुनाव नतीजों से सालभर पहले यानी मार्च 2016 में ही गोरखनाथ मंदिर में हुई राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और संत समाज की एक उच्चस्तरीय बैठक में योगी आदित्यनाथ को यूपी की कमान सौंपने की पटकथा लिखी जा चुकी थी।

एक दुकानदार से झगड़ा और ‘एंग्री यंग मैन’ का उदय

योगी आदित्यनाथ को अध्यात्म से राजनीति की राह पर लाने का श्रेय उनके गुरु महंत अवैद्यनाथ को जाता है। गोरखपुर के प्रसिद्ध गोलघर बाजार में छात्रों और एक दुकानदार के बीच हुआ विवाद योगी के जीवन का सबसे बड़ा ‘टर्निंग प्वाइंट’ बना। छात्रों के उस उग्र आंदोलन का नेतृत्व युवा योगी ने संभाला और वह रातों-रात ‘एंग्री यंग मैन’ के रूप में सुर्खियों में आ गए।

उनकी इसी मजबूत छवि को देखते हुए महंत अवैद्यनाथ ने साल 1998 में उन्हें अपनी पारंपरिक गोरखपुर लोकसभा सीट से चुनावी मैदान में उतार दिया। महज 26 साल की उम्र में चुनाव जीतकर योगी आदित्यनाथ देश के सबसे युवा सांसद बने। इसके बाद जनता के बीच उनकी निरंतर उपस्थिति और हिंदुत्व व विकास के एजेंडे के कारण गोरखपुर की जनता ने उन्हें लगातार 1999, 2004, 2009 और 2014 में भारी बहुमत से जिताकर संसद भेजा।

आज वही संन्यासी उत्तर प्रदेश की कानून-व्यवस्था का नया चेहरा बन चुका है, जिसकी नीतियां देश के लिए एक नजीर बन चुकी हैं।

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