उत्तराखंड की देवभूमि में चीड़ के पेड़ों से गिरने वाली पत्तियां, जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘पिरुल’ कहा जाता है, लंबे समय से वनों के लिए एक अभिशाप मानी जाती रही हैं। गर्मियों के दौरान ये सूखी पत्तियां बारूद की तरह काम करती हैं, जो जरा सी चिंगारी मिलते ही पूरे जंगल को आग की चपेट में ले लेती हैं। लेकिन अब मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में राज्य सरकार ने इस चुनौती को एक बड़े अवसर में बदल दिया है। पिरुल अब केवल एक ज्वलनशील अपशिष्ट नहीं, बल्कि उत्तराखंड की हरित अर्थव्यवस्था (Green Economy) का आधार बन रहा है।
वनाग्नि पर नियंत्रण और पारिस्थितिकी संतुलन
उत्तराखंड का लगभग 71 प्रतिशत भूभाग वनाच्छादित है, जिसमें से करीब 16 प्रतिशत हिस्से में चीड़ के जंगल हैं। आंकड़ों के अनुसार, हर साल जंगलों में 23 लाख मीट्रिक टन से अधिक पिरुल गिरता है। यह पिरुल न केवल आग फैलाने का कारण बनता है, बल्कि जमीन पर एक मोटी परत बना देता है, जिससे वर्षा का जल धरती के भीतर नहीं जा पाता और अन्य वनस्पतियां भी नहीं उग पातीं। सरकार द्वारा पिरुल एकत्रीकरण की पहल से अब जंगलों को आग से सुरक्षा मिल रही है और भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) में भी मदद मिल रही है।
ब्रिकेट्स और पैलेट्स: ईंधन का नया विकल्प
पिरुल के वैज्ञानिक प्रबंधन के लिए राज्य सरकार ब्रिकेट्स और पैलेट्स (कोयले की ईंटनुमा गुटिकाएं) बनाने वाली इकाइयों पर विशेष ध्यान दे रही है। पिरुल से बनी ये ईंटें उद्योगों और घरों में ईंधन के रूप में कोयले का एक बेहतरीन और प्रदूषण मुक्त विकल्प साबित हो रही हैं। वर्तमान में राज्य की 57 संवेदनशील रेंजों में से 9 में इकाइयां स्थापित हो चुकी हैं और जल्द ही शेष 48 रेंजों में भी इनका विस्तार किया जाएगा। इससे न केवल कचरे का निपटान हो रहा है, बल्कि स्वच्छ ऊर्जा को भी बढ़ावा मिल रहा है।
स्थानीय समुदायों के लिए स्वरोजगार की सौगात
इस योजना की सबसे बड़ी ताकत स्थानीय समुदायों की भागीदारी है। सरकार द्वारा पिरुल एकत्र करने वाले समूहों और संस्थाओं से इसे 10 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से खरीदा जा रहा है। उरेडा (UREDA) के माध्यम से संचालित इस पहल ने ग्रामीणों, विशेषकर महिला स्वयं सहायता समूहों के लिए आय का एक नया स्रोत खोल दिया है। जो ग्रामीण कल तक वनाग्नि से डरे रहते थे, वे अब जंगलों की सुरक्षा करते हुए अपनी आर्थिक स्थिति को भी मजबूत कर रहे हैं।
पिरुल से ‘अपशिष्ट से धन’ (Waste to Wealth) बनाने की यह मुहिम उत्तराखंड के सतत विकास के लिए एक मील का पत्थर है। यह मॉडल न केवल हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने का काम कर रहा है, बल्कि ‘वोकल फॉर लोकल’ के मंत्र को भी धरातल पर उतार रहा है। सीएम धामी की इस सूझबूझ भरी नीति ने यह सिद्ध कर दिया है कि यदि सही विजन हो, तो प्रकृति की चुनौतियों को भी समृद्धि के द्वार में बदला जा सकता है।
