चमोली/गोविंदघाट: हिमालय की ऊंचाइयों पर स्थित प्रसिद्ध सिख तीर्थस्थल श्री हेमकुंट साहिब की यात्रा को सुगम बनाने के लिए भारतीय सेना और सेवादारों ने कमर कस ली है। भारतीय सेना की 418 इंडिपेंडेंट फील्ड कंपनी (9 माउंटेन ब्रिगेड) और गुरुद्वारा श्री हेमकुंट साहिब प्रबंधन ट्रस्ट की संयुक्त टीम आज गुरुद्वारा कॉम्प्लेक्स तक पहुँच गई है।
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द्वार का उद्घाटन: अरदास के बाद गुरुद्वारा कॉम्प्लेक्स के द्वार आधिकारिक रूप से खोल दिए गए हैं।
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अटलकोटी ग्लेशियर पर कार्य: सेना अब बर्फ काटकर मार्ग को चौड़ा करने का चुनौतीपूर्ण कार्य करेगी।
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समय की बचत: अब टीम को हर शाम घांघरिया वापस नहीं लौटना पड़ेगा, जिससे कार्य में तेजी आएगी।
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अत्यधिक ऊंचाई: समुद्र तल से लगभग 15,200 फीट की ऊंचाई पर चल रहा है मिशन।
सेना का ‘मिशन सेवा’: कठिन चुनौतियों के बीच मार्ग निर्माण
गढ़वाल हिमालय की विषम परिस्थितियों में भारतीय सेना के जवान हर वर्ष निस्वार्थ भाव से सेवा का कार्य करते हैं। ताज़ा जानकारी के अनुसार, सेना की टीम अब हेमकुंट साहिब से अटलकोटी ग्लेशियर प्वाइंट तक नीचे की ओर ट्रैक को चौड़ा करने का काम शुरू करेगी। इस मार्ग के चौड़ा होने से तीर्थयात्रियों के लिए आवाजाही न केवल सुगम होगी, बल्कि सुरक्षा के लिहाज से भी यह बेहद महत्वपूर्ण कदम है।
भक्ति और साहस का संगम
गुरुद्वारा कॉम्प्लेक्स पहुंचने पर सबसे पहले ‘गुरु से अरदास’ की गई, जिसके बाद टीम ने वहां रहकर कार्य करने का निर्णय लिया। इससे पहले संसाधनों और मौसम की चुनौतियों के कारण टीम को प्रतिदिन घांघरिया बेस कैंप लौटना पड़ता था। अब कॉम्प्लेक्स में ही ठहरने की व्यवस्था होने से मार्ग तैयार करने के कार्य में अधिक गति आएगी। गुरुद्वारा प्रबंधन ने सेना के जवानों के इस जज्बे और निस्वार्थ सेवा के प्रति गहरा आभार व्यक्त किया है।
आस्था का केंद्र: श्री हेमकुंट साहिब
बर्फ से ढके पर्वत शिखरों और पवित्र सरोवर के बीच स्थित श्री हेमकुंट साहिब दुनिया के सबसे ऊंचे तीर्थस्थलों में से एक है। 4,632 मीटर की ऊंचाई पर स्थित होने के कारण यहाँ साल के अधिकांश समय भारी बर्फ जमी रहती है। हर साल यात्रा शुरू होने से पहले भारतीय सेना के इंजीनियर और जवान अपनी जान जोखिम में डालकर बर्फ काटकर रास्ता तैयार करते हैं, ताकि देश-दुनिया से आने वाले श्रद्धालु सुरक्षित दर्शन कर सकें।
