विपक्ष के बदले समीकरण: बिखरता ‘इंडिया’ गठबंधन बदल सकता है संसद के कामकाज का तरीका, मानसून सत्र में दिखेगा नया रूप

नई दिल्ली, 5 जून: हाल ही में संपन्न हुए विभिन्न राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजों ने देश के राजनीतिक माहौल और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) विरोधी खेमे की तस्वीर को पूरी तरह से बदल दिया है। जुलाई के अंत में शुरू होने वाले संसद के आगामी मानसून सत्र के दौरान देश की राजनीति और संसद के भीतर का नजारा पूरी तरह बदला हुआ नजर आ सकता है। 2024 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले जिस ‘इंडिया’ (INDIA) विपक्षी गठबंधन की नींव रखी गई थी, वह अब बड़े बिखराव और अनिश्चितताओं के दौर से गुजर रहा है।

गठन से लेकर बिखराव तक: कमजोर होती विपक्षी एकजुटता

‘इंडिया’ गठबंधन के गठन के बाद से ही इसमें लगातार आंतरिक तनाव और बड़े बदलाव देखने को मिले हैं। इसकी शुरुआत तब हुई थी जब गठबंधन के मुख्य रणनीतिकारों और सूत्रधारों में से एक, जनता दल (यूनाइटेड) के नेता नीतीश कुमार समय से पहले ही इस मोर्चे से बाहर हो गए थे।

इसके बाद, 2024 के लोकसभा चुनाव और फिर विभिन्न राज्यों के चुनावों के दौरान गठबंधन में शामिल क्षेत्रीय दलों के बीच सीटों के तालमेल पर आम सहमति बनना बेहद मुश्किल साबित हुआ। आम आदमी पार्टी (आप) ने तो यहाँ तक साफ कर दिया था कि यह गठबंधन केवल संसदीय चुनावों के लिए ही सीमित था।

तमिलनाडु में बड़ा उलटफेर: कांग्रेस-डीएमके का 11 साल पुराना नाता टूटा

गठबंधन को सबसे बड़ा झटका तमिलनाडु से लगा है, जहाँ आए चुनावी नतीजों ने सबको चौंका दिया। राज्य में फिल्म स्टार विजय की नई राजनीतिक पार्टी टीवीके (TVK) ने विधानसभा की 234 में से 108 सीटों पर ऐतिहासिक जीत दर्ज की。 इस नए घटनाक्रम के बाद कांग्रेस ने द्रमुक (DMK) के साथ अपना 11 साल पुराना गठबंधन तोड़कर टीवीके (TVK) का हाथ थाम लिया।

इस राजनीतिक कदम से आहत होकर डीएमके ने औपचारिक रूप से ‘इंडिया’ गठबंधन से बाहर होने का फैसला कर लिया है। डीएमके अब नई दिल्ली में अगले हफ्ते होने वाली विपक्षी गठबंधन के नेताओं की बैठक का बहिष्कार करेगी और आगामी मानसून सत्र में लोकसभा के भीतर भी कांग्रेस से अलग बैठेगी।

संसद में घटेगी विपक्ष की ताकत, मजबूत स्थिति में एनडीए

विपक्ष के इस बिखराव से संसद के भीतर संख्या बल का गणित पूरी तरह बदल गया है:

  • सत्तारूढ़ एनडीए का दबदबा: 18वीं लोकसभा में सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के पास 292 सीटों का मजबूत बहुमत है, जिसमें से अकेले भाजपा के पास 240 सीटें हैं। इसके अलावा उसे टीडीपी (16 सीटें), जेडीयू (12 सीटें), शिवसेना (7 सीटें) और एलजेपी-रामविलास (5 सीटें) का मजबूत समर्थन प्राप्त है। यह मजबूत आंकड़ा सत्ता पक्ष के लिए विधायी कामकाजों और मनचाहे कानूनों को पास कराने की राह आसान बनाता है।

  • घटती विपक्षी ताकत: 234 सीटों के साथ शुरुआत करने वाला ‘इंडिया’ गठबंधन अब सिकुड़ रहा है। लोकसभा में 98 सीटों के साथ कांग्रेस मुख्य विपक्षी दल बनी हुई है, जबकि 37 सीटों के साथ समाजवादी पार्टी दूसरा बड़ा गुट है।

  • डीएमके का अलग होना: लोकसभा में 22 सांसदों के साथ चौथी सबसे बड़ी विपक्षी ताकत ‘डीएमके’ के अलग होने से विपक्ष की प्रभावी ताकत घटकर अब केवल 212 सीटों के आसपास रह गई है。 इसके अलावा, आम आदमी पार्टी (आप) में हुई फूट के बाद उसके पास भी अब केवल 3 लोकसभा सांसद बचे हैं।

पश्चिम बंगाल के समीकरण और तृणमूल में बगावत की सुगबुगाहट

पश्चिम बंगाल की राजनीतिक स्थिति ने विपक्ष के संकट को और जटिल बना दिया है। राज्य के हालिया विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 294 में से 206 सीटें जीतकर तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 15 साल पुराने शासन को उखाड़ फेंका है। इस करारी हार के बाद पश्चिम बंगाल विधानसभा में टीएमसी को ‘नेता प्रतिपक्ष’ का पद भी अपने ही बागी नेताओं के हाथों गंवाना पड़ा।

इस राजनीतिक संकट के बीच, अब तक संसद की समन्वय बैठकों से दूरी बनाने वाली टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी खुद राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय होकर अपनी पार्टी का प्रतिनिधित्व करने जा रही हैं, ताकि सांसदों को एकजुट रखा जा सके।

इधर, तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय ने ‘सूत्रों’ के हवाले से एक बड़ा दावा किया है कि पार्टी के कई सांसद पाला बदल सकते हैं। सुखेंदु शेखर रॉय उन नेताओं में शामिल थे जिन्होंने आरजी कर मेडिकल कॉलेज में एक इंटर्न के साथ हुए जघन्य अपराध के खिलाफ खुलकर चिंता जताई थी और विरोध प्रदर्शनों का समर्थन किया था। लोकसभा में टीएमसी के पास कुल 28 सीटें हैं, ऐसे में दलबदल विरोधी कानून के दायरे से बचने के लिए 19 सांसदों का एक बड़ा समूह पाला बदलने की फिराक में बताया जा रहा है।

राज्यसभा का संख्या बल

राज्यसभा की कुल 245 सीटों में भी भाजपा 113 सदस्यों के साथ सबसे बड़े स्थान पर है, जिसे जेडीयू (4) और शिवसेना (2) का साथ है। विपक्षी खेमे में टीएमसी के पास सुखेंदु शेखर रॉय सहित 13 सांसद हैं। वहीं, यदि डीएमके के 8 राज्यसभा सांसद भी संसद में अलग बैठने का फैसला करते हैं, तो उच्च सदन में भी विपक्ष की धार काफी कमजोर हो जाएगी।

निश्चित रूप से, क्षेत्रीय दलों की बदलती प्राथमिकताओं और आंतरिक फूट के चलते आगामी मानसून सत्र में संसद के भीतर विपक्ष का वह पुराना आक्रामक रूप देखने को नहीं मिलेगा, जिससे विधायी प्रक्रियाओं के संचालन का तरीका पूरी तरह बदल सकता है。

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