अंकिता भंडारी हत्याकांड: दोषियों को उम्रकैद, पीड़ित परिवार को ₹25 लाख की सहायता और रोजगार के प्रयास

देहरादून। उत्तराखण्ड के बहुचर्चित अंकिता भंडारी हत्याकांड में राज्य सरकार की कार्रवाई, जांच और पीड़ित परिवार को दी गई सहायता एक बार फिर चर्चा में है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में मामले की जांच के लिए विशेष जांच दल (SIT) गठित किया गया, आरोपियों को गिरफ्तार किया गया और न्यायालय में अभियोजन की प्रक्रिया आगे बढ़ी। मामले में तीनों आरोपियों को दोषी ठहराते हुए आजीवन कठोर कारावास की सजा सुनाई गई।

अंकिता भंडारी की हत्या ने पूरे उत्तराखण्ड को झकझोर दिया था। एक युवा महिला अपने भविष्य के सपनों के साथ काम करने निकली थी, लेकिन उसकी हत्या की खबर ने महिलाओं की सुरक्षा और न्याय व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। इस मामले में पीड़ित परिवार को न्याय दिलाना और उन्हें सहायता उपलब्ध कराना प्रमुख मुद्दे बने रहे।

घटना के बाद 24 घंटे में हुई आरोपियों की गिरफ्तारी

वर्ष 2022 में ऋषिकेश के निकट वनंतरा रिजॉर्ट में कार्यरत अंकिता भंडारी की हत्या का मामला सामने आने के बाद पुलिस ने कार्रवाई शुरू की। पुलिस के अनुसार, घटना सामने आने के 24 घंटे के भीतर तीनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया था।

मामले की गंभीरता को देखते हुए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्देश पर विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया गया। जांच के दौरान डिजिटल, तकनीकी, फॉरेंसिक और भौतिक साक्ष्य जुटाए गए। गवाहों के बयान और अन्य महत्वपूर्ण तथ्यों का विश्लेषण करने के बाद एसआईटी ने 88 दिनों में जांच पूरी कर लगभग 500 पृष्ठों का आरोपपत्र न्यायालय में दाखिल किया।

सरकार की ओर से मामले में प्रभावी अभियोजन सुनिश्चित करने के प्रयास किए गए। न्यायालय ने उपलब्ध साक्ष्यों और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर तीनों आरोपियों को दोषी ठहराया।

तीनों दोषियों को आजीवन कठोर कारावास

30 मई 2025 को कोटद्वार स्थित अपर जिला एवं सत्र न्यायालय ने पुलकित आर्य, सौरभ भास्कर और अंकित गुप्ता को दोषी करार देते हुए आजीवन कठोर कारावास की सजा सुनाई।

यह फैसला न्यायालय में प्रस्तुत साक्ष्यों और सुनवाई की प्रक्रिया के आधार पर आया। मामले में दोषियों के विरुद्ध गैंगस्टर अधिनियम के तहत भी कार्रवाई की गई।

अंकिता भंडारी प्रकरण ने प्रदेश में महिलाओं की सुरक्षा, अपराधों की जांच और न्यायिक प्रक्रिया को लेकर व्यापक बहस को जन्म दिया। इस मामले में पुलिस जांच, अभियोजन और न्यायालय की भूमिका अलग-अलग रही, जबकि सरकार की जिम्मेदारी कानून के अनुरूप कार्रवाई सुनिश्चित करने और पीड़ित परिवार को सहायता देने की रही।

परिवार की मांगों और भावनाओं को दिया गया महत्व

अंकिता के परिजनों ने मामले की जांच और न्यायिक प्रक्रिया को लेकर अपनी मांगें उठाईं। सरकार की ओर से परिवार की मांग के अनुरूप सरकारी अधिवक्ताओं में बदलाव किए गए। वहीं, परिजनों की सीबीआई जांच की मांग पर मुख्यमंत्री ने जांच कराने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई।

इस घटनाक्रम ने यह सवाल भी सामने रखा कि गंभीर आपराधिक मामलों में पीड़ित परिवार का विश्वास बनाए रखने के लिए उनकी बात सुनना और उनकी आशंकाओं पर कानून के दायरे में निर्णय लेना कितना महत्वपूर्ण है।

परिवार को ₹25 लाख की आर्थिक सहायता, रोजगार के भी प्रयास

अंकिता के निधन के बाद उसके परिवार को आर्थिक संबल देने के लिए राज्य सरकार की ओर से 25 लाख रुपये की सहायता उपलब्ध कराई गई। इसके अतिरिक्त परिवार के सदस्यों को रोजगार उपलब्ध कराने के लिए भी कदम उठाए गए।

इन प्रयासों का उद्देश्य परिवार को इस कठिन समय में सहायता देना और उन्हें आर्थिक चुनौतियों से उबरने में सहयोग करना था। किसी गंभीर अपराध से प्रभावित परिवार के लिए न्यायिक प्रक्रिया के साथ आर्थिक और सामाजिक सहयोग भी महत्वपूर्ण होता है।

महिला सुरक्षा और न्याय व्यवस्था पर फिर चर्चा

अंकिता भंडारी हत्याकांड केवल एक आपराधिक मामला नहीं रहा, बल्कि इसने उत्तराखण्ड में महिलाओं की सुरक्षा, कार्यस्थलों पर उनकी संरक्षा और अपराधों की निष्पक्ष जांच जैसे मुद्दों को भी प्रमुखता से उठाया।

इस मामले में आरोपियों की गिरफ्तारी, एसआईटी की जांच, न्यायालय में अभियोजन और दोषियों को सजा न्यायिक प्रक्रिया के महत्वपूर्ण पड़ाव रहे। वहीं, पीड़ित परिवार को आर्थिक सहायता और रोजगार के प्रयासों ने प्रभावित परिवारों के पुनर्वास की आवश्यकता को भी रेखांकित किया।

अंकिता को खोने का दुख उसके परिवार के लिए कभी कम नहीं हो सकता। इस मामले से यही संदेश उभरता है कि महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना, अपराधों की निष्पक्ष जांच करना और पीड़ित परिवारों को न्यायिक प्रक्रिया के दौरान आवश्यक सहायता उपलब्ध कराना शासन-प्रशासन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।