कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में भाजपा के कद्दावर नेता और नंदीग्राम के नायक सुवेंदु अधिकारी के सबसे भरोसेमंद सहयोगी, चंद्रनाथ रथ अब हमारे बीच नहीं रहे। उनकी हत्या की खबर ने न केवल उनके परिवार को झकझोर दिया है, बल्कि राजनीतिक गलियारों में भी शोक की लहर दौड़ा दी है। 42 वर्षीय रथ पिछले सात वर्षों से सुवेंदु अधिकारी के राजनीतिक जीवन के एक अनिवार्य स्तंभ थे।
आध्यात्मिक झुकाव और वायुसेना का सफर
चंद्रनाथ रथ का व्यक्तित्व विरोधाभासों से भरा लेकिन बेहद सरल था। उनके परिवार के अनुसार, छात्र जीवन से ही वे आध्यात्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। एक समय ऐसा भी था जब उन्होंने दुनिया के मोह-माया त्याग कर संन्यासी बनने का विचार कर लिया था। हालांकि, किस्मत उन्हें सैन्य सेवा की ओर ले गई, जहाँ उन्होंने भारतीय वायुसेना में करीब 18 वर्षों तक देश की सेवा की। पूर्वी मिदनापुर—जो सुवेंदु अधिकारी का भी गृह जिला है—से ताल्लुक रखने के कारण रथ का परिवार लंबे समय से अधिकारी परिवार का करीबी रहा।
सुवेंदु अधिकारी की ‘परछाई’ के रूप में पहचान
वायुसेना से सेवामुक्त होने के बाद, 2019 में चंद्रनाथ रथ स्थायी रूप से सुवेंदु अधिकारी के साथ जुड़ गए। उस समय अधिकारी तृणमूल कांग्रेस (TMC) सरकार में मंत्री थे। रथ की वफादारी की परीक्षा तब हुई जब 2021 के विधानसभा चुनाव से पहले सुवेंदु अधिकारी ने भाजपा का दामन थामा। रथ बिना किसी हिचकिचाहट के उनके साथ रहे। सुवेंदु के व्यस्त कार्यक्रमों को तय करने से लेकर महत्वपूर्ण फाइलों की सुरक्षा और बैठकों की तैयारी तक, रथ ने एक कुशल रणनीतिकार और विश्वसनीय निजी सहायक की भूमिका निभाई।
राजनीतिक कद और अधूरा सपना
2021 में नंदीग्राम में ऐतिहासिक जीत के बाद जब सुवेंदु अधिकारी नेता प्रतिपक्ष बने, तब भी रथ उनकी परछाई बनकर साथ रहे। हालिया विधानसभा चुनावों में भाजपा की बड़ी जीत और ममता बनर्जी पर सुवेंदु अधिकारी की जीत के बाद, राजनीतिक हलकों में यह चर्चा आम थी कि यदि राज्य में सत्ता का समीकरण बदलता है, तो चंद्रनाथ रथ मुख्यमंत्री के कार्यकारी सहायक के रूप में एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभालेंगे। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।
एक समर्पित जीवन का दुखद अंत
चंद्रनाथ रथ की हत्या केवल एक सहयोगी की क्षति नहीं है, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति का अंत है जिसने अनुशासन और निष्ठा की नई मिसाल पेश की थी। सुवेंदु अधिकारी के राजनीतिक उत्थान और उनकी कठिन चुनौतियों में रथ हमेशा ढाल बनकर खड़े रहे। आज उनकी कमी को न केवल उनके परिवार और गृह जिले में महसूस किया जा रहा है, बल्कि बंगाल भाजपा के संगठन में भी एक बड़ा शून्य पैदा हो गया है।
