उत्तराखंड के पूर्व सीएम भगत सिंह कोश्यारी को मिलेगा ‘पद्मभूषण’; 25 मई को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु करेंगी सम्मानित

नई दिल्ली/देहरादून: उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री और महाराष्ट्र के पूर्व राज्यपाल श्री भगत सिंह कोश्यारी को आगामी 25 मई को देश के प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान ‘पद्मभूषण’ से नवाजा जाएगा। नई दिल्ली में आयोजित एक भव्य समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु उन्हें इस सम्मान से सम्मानित करेंगी। ‘भगत दा’ के नाम से लोकप्रिय श्री कोश्यारी को यह सम्मान उनके द्वारा किए गए उत्कृष्ट सामाजिक कार्यों, शिक्षा के क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान और सार्वजनिक जीवन में राष्ट्र सेवा के लिए दिया जा रहा है।

सुदूर पहाड़ी गांव से निकलकर शिक्षा जगत में बनाई पहचान

17 जून, 1942 को उत्तराखंड के बागेश्वर जिले के अत्यंत सुदूर गांव पलानधुरा में जन्मे श्री कोश्यारी ने विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अपनी उच्च शिक्षा पूरी की। उन्होंने 1964 में आगरा विश्वविद्यालय से संबद्ध अल्मोड़ा कॉलेज से अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर (MA) की डिग्री हासिल की। इसके बाद उन्होंने एटा (उत्तर प्रदेश) के राजा का रामपुर में एक व्याख्याता (Lecturer) के रूप में अपने पेशेवर सफर की शुरुआत की।

सीमावर्ती क्षेत्रों में शिक्षा का उजियारा और ‘पर्वत पीयूष’ का संपादन

राष्ट्र निर्माण में शिक्षा की भूमिका को सर्वोपरि मानते हुए उन्होंने 1965 के बाद खुद को पूरी तरह शैक्षणिक और समाज सेवा के लिए समर्पित कर दिया।

  • सरस्वती शिशु मंदिर की स्थापना: वर्ष 1966 में उन्होंने उत्तराखंड के सीमावर्ती और दुर्गम जिले पिथौरागढ़ में ‘सरस्वती शिशु मंदिर’ की नींव रखी, जिसने क्षेत्र में शिक्षा की तस्वीर बदल दी।

  • संस्थागत योगदान: उन्होंने पिथौरागढ़ में विवेकानंद इंटर कॉलेज की स्थापना में मुख्य भूमिका निभाई और कुमाऊं विश्वविद्यालय की कार्यकारी परिषद के सदस्य (1979-1990) के रूप में शैक्षिक नीतियों को आकार दिया।

  • पत्रकारिता और आपातकाल: सामाजिक चेतना जगाने के लिए उन्होंने पिथौरागढ़ से हिंदी साप्ताहिक अखबार “पर्वत पीयूष” का प्रकाशन शुरू किया। राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान जनहित की आवाज़ उठाने के कारण उन्हें मीसा (MISA) के तहत जेल भी जाना पड़ा।

उत्तर प्रदेश से उत्तराखंड तक का राजनीतिक सफर

श्री कोश्यारी का राजनीतिक जीवन बेहद समृद्ध और उपलब्धियों से भरा रहा है:

  • वर्ष 1997: उत्तर प्रदेश विधान परिषद (MLC) के सदस्य मनोनीत हुए।

  • वर्ष 2000: उत्तराखंड राज्य गठन के बाद अंतरिम सरकार में कैबिनेट मंत्री बने।

  • मुख्यमंत्री व विपक्ष के नेता: इसके बाद उन्होंने थोड़े समय के लिए उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के रूप में राज्य की कमान संभाली और बाद में विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी भी निभाई।

संसद में गूंजी आवाज़: ओआरओपी और ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेल लाइन की पैरवी

भगत सिंह कोश्यारी ने देश के दोनों सदनों में उत्तराखंड का प्रतिनिधित्व किया। वह 2008 में राज्य सभा और 2014 में नैनीताल-ऊधम सिंह नगर सीट से लोक सभा सदस्य चुने गए।

संसद की ‘याचिका समिति’ के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने ‘वन रैंक वन पेंशन’ (OROP) जैसे संवेदनशील मुद्दे और उत्तराखंड की जीवनरेखा मानी जाने वाली ऋषिकेश-कर्णप्रयाग रेलवे लाइन व बुनियादी ढांचे के विकास के लिए ऐतिहासिक सिफारिशें प्रस्तुत कीं। इसके अलावा उत्तराखंड के ऊर्जा मंत्री रहते हुए उन्होंने लंबे समय से लंबित टिहरी हाइड्रो प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने और विस्थापितों के पुनर्वास में अहम भूमिका निभाई।

महाराष्ट्र और गोवा के राज्यपाल के रूप में सेवाएं

संसदीय राजनीति के बाद 5 सितंबर, 2019 को उन्हें महाराष्ट्र का राज्यपाल नियुक्त किया गया। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने राज्य के लगभग सभी जिलों का दौरा किया और जमीनी स्तर पर सक्रिय रहे। अगस्त 2020 में उन्हें गोवा के राज्यपाल का अतिरिक्त प्रभार भी सौंपा गया था।

लेखक के रूप में उत्तराखंड के संघर्ष को दी ज़ुबान

एक राजनेता और शिक्षाविद् होने के साथ-साथ ‘भगत दा’ एक गंभीर लेखक भी हैं। उन्होंने उत्तराखंड राज्य आंदोलन और उसके विकास की रूपरेखा पर दो महत्वपूर्ण पुस्तकें लिखी हैं:

  1. “उत्तरांचल प्रदेश क्यों”

  2. “उत्तरांचल प्रदेश: संघर्ष एवं समाधान”

आरएसएस के एक निष्ठावान स्वयंसेवक के रूप में अपना जीवन शुरू करने वाले श्री कोश्यारी का पूरा जीवन सादगी, अनुशासन और जनसेवा का एक प्रेरक उदाहरण है, जिसे अब ‘पद्मभूषण’ के जरिए राष्ट्रीय स्तर पर सराहा जा रहा है।

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