नैनीताल। लोकसभा अध्यक्ष श्री ओम बिरला ने बुधवार को नैनीताल में सतत विकास और पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखने के लिए एक महत्वपूर्ण विजन प्रस्तुत किया। डॉ. रघुनंदन सिंह टोलिया प्रशासनिक अकादमी में आयोजित एक विशेष सत्र में, उन्होंने सरकारी संस्थानों, पंचायती राज संस्थाओं, स्थानीय निकायों और वन पंचायतों के प्रतिनिधियों को संबोधित करते हुए स्पष्ट किया कि पर्यावरण की रक्षा केवल सरकारी नीतियों से नहीं, बल्कि सामुदायिक भागीदारी और पारंपरिक ज्ञान के समन्वय से ही संभव है।
लोकतंत्र की सशक्त कड़ी: वन पंचायतें
श्री बिरला ने उत्तराखंड की विशिष्ट ‘वन पंचायत’ व्यवस्था की मुक्तकंठ से सराहना की। उन्होंने वन पंचायतों को “भारतीय लोकतंत्र की सबसे मजबूत कड़ी” करार देते हुए कहा कि जमीनी स्तर की ये संस्थाएं सुशासन और संरक्षण का सफल मॉडल हैं। उनके अनुसार, स्थानीय समुदायों का अनुभव किसी भी केंद्रीय नीति से कमतर नहीं है। उन्होंने रेखांकित किया कि उत्तराखंड की ये पंचायतें न केवल वनों का संवर्धन कर रही हैं, बल्कि आत्मनिर्भर भारत के संकल्प को साकार करते हुए रोजगार के नए अवसर भी सृजित कर रही हैं।
जल, जंगल और जमीन का अटूट संबंध
पर्यावरण की मूल अवधारणा पर प्रकाश डालते हुए लोकसभा अध्यक्ष ने कहा कि जल, जंगल और जमीन मानव जीवन के आधार स्तंभ हैं। इनका संरक्षण कोई विकल्प नहीं, बल्कि हमारा सामूहिक नैतिक दायित्व है। उन्होंने उत्तराखंड की समृद्ध विरासत का उल्लेख करते हुए कहा कि यहाँ की परंपराओं में वृक्षों और जल स्रोतों के प्रति जो श्रद्धा है, वह दुनिया के लिए सतत जीवनशैली (Sustainable Lifestyle) का एक जीवंत उदाहरण है।
पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक शोध का एकीकरण
श्री बिरला ने योग और आयुर्वेद की वैश्विक स्वीकार्यता का जिक्र करते हुए उत्तराखंड को इन विधाओं का केंद्र बताया। उन्होंने वन पंचायतों से आह्वान किया कि वे औषधीय पौधों के संरक्षण और उनके ‘वैल्यू एडिशन’ (मूल्य संवर्धन) पर ध्यान दें। उन्होंने इस बात पर चिंता जताई कि जहाँ एलोपैथी में व्यापक शोध हुए हैं, वहीं हमारे पारंपरिक औषधीय ज्ञान को और अधिक वैज्ञानिक शोध और आधुनिक स्वास्थ्य प्रणालियों के साथ जोड़ने की आवश्यकता है।
जलवायु परिवर्तन और महिला शक्ति
वैश्विक जलवायु संकट पर चर्चा करते हुए श्री बिरला ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘पर्यावरण अनुकूल जीवनशैली’ के संदेश को दोहराया। उन्होंने विशेष रूप से उत्तराखंड की महिलाओं की भूमिका की सराहना की, जो सदियों से वन संरक्षण के आंदोलनों में अग्रणी रही हैं। उन्होंने कहा कि वनाग्नि (Forest Fire) जैसी गंभीर चुनौतियों से निपटने में स्थानीय निवासियों का व्यावहारिक अनुभव और सक्रियता ही सबसे प्रभावी हथियार है।
संवाद से समाधान की ओर
कार्यक्रम के दौरान श्री बिरला ने त्रिस्तरीय पंचायत प्रतिनिधियों और वन पंचायत सदस्यों से सीधा संवाद किया। प्रतिनिधियों ने वनाग्नि रोकथाम, वित्तीय सहायता और तकनीकी संसाधनों की कमी जैसे मुद्दे उठाए। लोकसभा अध्यक्ष ने इन सुझावों को गंभीरता से सुनते हुए आश्वासन दिया कि जमीनी स्तर की इन चुनौतियों और सुझावों को राष्ट्रीय पटल पर उठाया जाएगा ताकि नीतियों के क्रियान्वयन में आने वाली बाधाओं को दूर किया जा सके। इस अवसर पर सांसद श्री अजय भट्ट ने भी क्षेत्र की विशिष्ट भौगोलिक और पर्यावरणीय परिस्थितियों पर अपने विचार साझा किए।
श्री ओम बिरला का यह संबोधन इस बात की पुष्टि करता है कि भविष्य का भारत तभी सुरक्षित और समृद्ध होगा, जब हम अपनी आधुनिक प्रगति को अपनी पारंपरिक जड़ों और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के साथ जोड़कर चलेंगे।
